कुतुबमीनार भारत की एक ऐतिहासिक मीनार है। इसकी गिनती भारत की सबसे बड़ी दूसरे मीनार में की जाती है। क़ुतुब मीनार को देखने के लिए पर्यटक साल भर देश विदेश से आते रहते हैं। क़ुतुब मीनार देखने में बहुत सुंदर दिखाई देती है। कुतुबमीनार भारत की राजधानी दिल्ली के दक्षिण भाग में स्थित है। यह एक ऐतिहासिक मीनार है।
इस मीनार को बनाने के लिए संगमरमर तथा बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है। इस मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा 12 वीं शताब्दी में शुरू किया गया था। परंतु किसी कारणवश कुतुबुद्दीन के शासनकाल में इस मीनार का निर्माण पूर्ण नहीं हो सका। इसके बाद इस मीनार का निर्माण इल्तुतमिश के द्वारा पूरा कराया गया।
मीनार की संरचना दिल्ली में बनी यह कुतुब मीनार लगभग 73 मीटर लंबी तथा 14.3 मीटर आधार के ब्यास तथा 2.7 मीटर शीर्ष व्यास वाली गुंबद हैं। इस घुम्मन में कुल 379 सीढ़ियां है। जिससे इस मीनार की ऊंचाई की भव्यता पता लगता है। यह मीनार प्रातः सुबह 6:00 बजे से शाम के 6:00 बजे तक खुलती है।
क़ुतुब मीनार का इतिहास कुतुबमीनार को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल भी घोषित किया गया है। यह मीनार भारत के प्रमुख पर्यटक केंद्रों में से एक है। इस मीनार को घूमने के लिए पर्यटक विदेशों से भी आते हैं। यह मीनार बहुमंजिला होने के साथ ही बहुत ऊंची मीनार है। इस मीनार में बहुत सुंदर नक्काशी की गई है। जो कि इस मीनार की सुंदरता को और भी बढ़ा देती है।
पर्यटक इस मीनार को देखने के साथ घूमने के लिए भी आते हैं। परंतु इस मीनार के ऊपर (अंदर) जाने की अनुमति नहीं है। कुतुबमीनार में प्रवेश के लिए जो मुख्य द्वार है। उस द्वार को प्रशासन के द्वारा बंद कर दिया गया है। इस कारण इस मीनार के ऊपर नहीं जा सकते हैं।
माना जाता है। कि मीनार में बहुत छोटी सीढ़ियों का निर्माण कराया गया है। इन सीढ़ियों के द्वारा अगर कोई ऊपर जाएगा तो एक बार में इन से एक व्यक्ति ही जा सकता है। इस मीनार के अंदर प्रकाश का कोई मुख्य स्त्रोत नहीं होने के कारण मीनार के अंदर हमेशा अंधेरा रहता है। इस कारण सुरक्षा का भी कोई इंतजाम नहीं है।
इस मीनार में कुछ घटनाएं घटित हो चुकी हैं। इसी के कारण किसी को मीनार के अंदर जाने की अनुमति नहीं है। प्राचीन समय में भूकंप आने के कारण इस मीनार को क्षति पहुंची थी। परंतु उस समय के शासकों द्वारा इस मीनार को पुनः निर्मित करा दिया गया था।
एक बार जब भूकंप आया था। तब इस मीनार की ऊपरी मंजिलों को क्षति पहुंची थी। जिनका पुनः निर्माण कार्य फिरोजशाह के द्वारा कराया गया। इसके बाद एक बार और भूकंप के आ जाने के कारण यह मीनार क्षतिग्रस्त हुई थी। उस समय सिकंदर लोदी के द्वारा इसे पुनः निर्मित कराया गया था।
इस मीनार के किनारों को बेलनाकार तथा घुमाता आकृतियों से सुशोभित किया गया है। कुतुब मीनार के आधार में एक कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद है। कुतुबमीनार परिसर में लगभग 7 मीटर ऊंचा एक ब्राह्मी शिलालेख एवं लोहा स्तंभ है। मीना की दीवारों पर कुरान के पौराणिक शास्त्र की बातें लिखी हुई हैं।
आकर्षण का केंद्र प्राचीन समय से ही यह मीनार पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रही है। प्राचीन समय की मान्यता के अनुसार इस मीनार के सामने पीठ कर खड़े होकर लोहा स्तंभ की और चक्कर लगाने से व्यक्ति की सभी मनोकामना पूर्ण होती हैं। शायद यही वजह है। कि हर साल देश दुनिया के हर क्षेत्र से यहां पर्यटक आते हैं।
कुतुबुद्दीन ऐबक के भारत आने के बाद उसने राजपूतों के साथ युद्ध करना आरंभ कर दिया था। एवं राजपूतों को हराने में सफल रहा। राजपूतों की हार पर अपनी विजय के जश्न में कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा इस अद्भुत एवं आकर्षक मीनार को बनवाने आदेश दिया। कुतुबमीनार के चारों ओर हरे-भरे पौधे बाला एक बगीचा है।
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