Tuesday, 4 February 2020

Ek Budhiya ki atmakatha in hindi

दोस्तों आज के इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको 85 साल  की एक बूढ़ी औरत की आत्मकथा से रूबरू कराने जा रहे हैं। इस पोस्ट को पूरी पढ़ें।
Ek Budhiya ki atmakatha in hindi 
मैं बूढ़ी औरत हूं। मेरी उम्र 85 वर्ष है। अब मुझसे कुछ काम भी नहीं बनता है। और मैं बड़ी कठिनाइयों के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रही हूं। क्योंकि मेरे पास अब मेरा कोई परिवार नहीं है। और ना ही मेरा जीवन साथी मेरे साथ है। मेरे दो बच्चे है। जिन्हें पाल पोस कर मैंने बड़ा किया उनकी शादी की। अब वह मुझे अपने साथ नहीं रखते हैं। क्योंकि मैं बूढ़ी हो गई हूं। इसलिए उन्होंने मुझे एक वृद्धा आश्रम में छोड़ दिया है। और वह मुझे कभी भी मिलने नहीं आते हैं। जब मेरे दोनों बच्चे बहुत छोटे थे। तब मेरे पति का देहांत हो गया था। और जब से मैंने इन दोनों बच्चों को बहुत मुसीबत सहकर कर इनका पालन पोषण किया है। लेकिन अब इन्हें मेरी कोई भी परवाह नहीं है।

मुझे मेरे दोनों बच्चे एक समान प्यारे हैं। मैंने इन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाई। जिससे यह अपने भविष्य को सुधार सकें। जिस गरीबी में मुझे जीना पड़ा उस गरीबी में इन बच्चों को ना जीना पड़े। उन्होंने अच्छी शिक्षा प्राप्त की और आप दोनों अच्छा कमाते भी हैं। मुझसे जब तक काम बनता था। उन्होंने तब तक मुझे अपने साथ रखा और अब मुझसे कुछ काम नहीं बनता है। तो उन्होंने मुझे वृद्ध आश्रम में छोड़ दिया। में यहां रहकर किसी तरह अपना जीवन यापन कर रही हूं। लेकिन मुझे इस वृद्ध आश्रम से कोई शिकायत नहीं है।

मुझे यहां पर घर जैसी हर सुविधाएं  मिलती हैं। जब मैं सुबह उठती हूं। तो मुझे चाय दी जाती है। एवं जितना मुझसे बनता है। उतना काम मैं स्वयं करती हूं। मेरे साथ मेरे जैसी प्रताड़ित अन्य महिलाएं भी हैं। जिनके साथ में खुश रहती हूं। हम सभी आपस में मिलजुल कर काम को करते हैं। मैं कुछ महिलाओं के साथ घूमने के लिए जाती हूं। मैं अधिकतर मेरा समय मेरे साथियों के साथ गुजारती हूं। जिससे कि मुझे मेरे बच्चों तथा घरवालों की याद ना आए। क्योंकि मैं उनके बारे में सोच कर कुछ कर भी नहीं सकती यदि मैं उनके पास जाना भी चाहती हूं। तो वह मुझे स्वीकार नहीं  करेंगे।क्योंकि मैं एक बुजुर्ग महिला हू। इस वजह से वह मुझे स्वीकार नही करेंगे।

लेकिन वह यह नहीं जानते।  वह भी एक दिन  बूढ़े हो जाएंगे और उनके बच्चे उन्हें घर से बाहर निकाल देगे। तब उन्हें इस बात का एहसास होगा। किसी बुजुर्ग को घर से बाहर निकालने पर उसे कितनी तकलीफ का सामना करना पड़ता है। अभी उन्हें इस बात का कोई भी अफसोस नहीं होता है। कि हमारी मां किस हाल में और कैसी हैं। जब तक मैंने में बच्चों का साथ दिया और मुझसे जितना बनता था। मैं उतना काम करती थी। लेकिन अब मुझसे काम बिल्कुल नहीं बनता है। तो उन्होंने मुझे घर से बाहर निकाल दिया। लेकिन मैं फिर भी उन्हें दुआ देती हूं।

वह हमेशा खुश रहे क्योंकि उन्होंने जो किया वह उनका कर्म था। लेकिन मैं तो अपने कर्म से पीछे  नहीं हटऊंगी। मैं उन्हें हमेशा दुआ देती हूं। वह और उनके बच्चे खुश रहें। क्योंकि एक ना एक दिन सभी को  बूढ़ा होना है। मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं है। कि मैं एक वृद्धा आश्रम में रहती हूं। क्योंकि मुझे इस बृद्धा आश्रम से घर से ज्यादा सुख सुविधाएं मिलती हैं।।और ना मुझे यहां पर किसी के ताने अथवा गालियां सुननी पड़ती हैं। जिस वक्त जो करना है। वह काम करो यहां पर कोई रोकने या टोकने वाला नहीं होता है। मैं यहां रह कर अपने साथियों के साथ बहुत प्रसन्न हूं।

मैं उस व्यक्ति को धन्यवाद देना चाहती हूं। जिस व्यक्ति ने इन जैसे अनाथ आश्रम की शुरुआत की। यह आश्रम नहीं होता तो मेरा क्या होता। अनाथ आश्रम वाले बहुत अच्छे हैं। हमारा बहुत अच्छे से ख्याल रखते हैं। हम सभी बुजुर्ग महिलाएं इस आश्रम में रहकर बहुत खुश  है। क्योंकि हमें इस आश्रम में हमारी आवश्यकता के अनुसार हर चीज मुहैया कराई जाती हैं। जिसकी हमें आवश्यकता होती है। हम सभी महिलाएं इस वृद्ध आश्रम में बहुत खुश हैं। और सुबह शाम भगवान के भजन करते हैं। जिससे हमारे मन को बहुत शांति का अनुभव होता है। जब कमी भी मुझे मेरे घर वालों की याद आती है।

मैं उस वक्त अपने ईश्वर की भक्ति करने लगती हूं। जिससे मेरा मन सहल जाता है। जब सबसे पहले मुझे मेरे बच्चों ने इस वृद्ध आश्रम में छोड़ा था। तो उस वक्त मुझे बहुत बुरा लगा था। परंतु अब मेरे जेसी और अन्य महिलाओं से मेरी मुलाकात हो गई है। जिससे अब मुझे बुरा नहीं लगता है। और अब मैं इनके साथ खुशी-खुशी रहती हूं। अब मेरी मुलाकात इन सभी महिलाओं से हो चुकी हैं। और अब हम एक साथ खुशी-खुशी रहते हैं। हम सभी एक दूसरे की मदद करते हैं। हम सभी महिलाएं यहां एक परिवार के रूप में रहते हैं। इस कारण भी हमें हमारे घर की याद नहीं आती है। अब मैं इस आश्रम में रहकर बहुत खुश हूं। और मुझे मेरे परिवार की याद नहीं आती है। मैं हमेशा यही दुआ करती हूं कि वह खुश रहें।

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